Monday, January 31, 2011

सस्वर क्रांति का आग़ाज़ अब हो जाने दो

बहुत जाग चूका झूठा दंभ , इसे सो जाने दो,
सस्वर क्रांति का आग़ाज़ अब हो जाने दो.

 बहुत लुट चूका चैन अमन ,थक गया जीवन
एक नवीन युग आने दो,अब अमन चैन छाने दो. ,

कह रही विगत  विभावरी कुछ संदेशा,
आनेवाली रश्मि को ये संदेशा लाने दो .

क्या देखा था मिलकर सपना ऐसे जीर्ण भारत का ?
आगे आओ डट जाओ ,इसे फिरसे तरुणी कहलाने  दो .

बहुत जाग चूका झूठा दंभ , इसे सो जाने दो,
सस्वर क्रांति का आग़ाज़ अब हो जाने दो.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

Wednesday, December 1, 2010

आज धीरे से पांव उतारा है

आज धीरे से पांव उतारा है ,
राजनीति के दलदल में,
ये सोंच कर ,
शायद कर सकूँ ,
एक सवच्छ समाज का निर्माण
विचलित सा है ,
अडिग सा रहनेवाला मन ,
कमी आ गयी है ,
अटूट मनोबल में.
हर झोका पवन का
जो बिखरती थी अपनत्व सा ,
आज बंट कर रह गयी ,
जातिवाद के बंधन में.
अब सच्चाई के साथ ,
नहीं लड़ा करते लोग,
ये राजनीति ,
बाज़ार हो गयी है ,
नोटों के बोल का,
जो जितना बोल लगाया ,
खरीद ले गया वोटों को .
कितना योग्य है,
ईमानदारी से भरा है ,
कोई फर्क नहीं ,
बस वो ही पलड़ा भारी है,
जो उपर है.चांदी के खनक से.
आज मानवता कों,
यूँ बिकता देख कर ,
मुझे मानव जाति में होना ,
भारी लग रहा लोगों का.
यही चलता रहा तो क्या,
निर्माण कर पाएंगे ??
हम एक स्वच्छ समाज का .
फिर भी मन मेरा ,
अभी तक हारा नहीं,
अब तक उम्मीद है मुझे ,
शायद बदल पाऊं इस भ्रष्ट समाज कों .

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

Saturday, September 18, 2010

व्यंग्य लेख ( फिर आया वोटों का मौसम ) गीतों के साथ

व्यंग्य लेख ( फिर आया वोटों का मौसम ) गीतों के साथ .

जब नेता जी भारी मतों से जीतकर कुर्सी पायें तो फूले नहीं समाये.
उनके मन में गुदगुदी कुछ इस तरह हुई ................

" आज मैं ऊपर,आसमां  नीचे,
आज मैं आगे ज़माना है पीछे,
टेल मी  ओ खुदा अब मै क्या करूँ ?????
लेके मर्सिडीस या पैदल ही चलूँ ????""

जब वो लोकप्रिय होगये ,सत्ता में अपनी साख  बना चुके तो उनके कई विरोधी भी पैदा हो जाते है. फिर अपने दबदबे से जितने भी उनके नीचे काम करने वाले  पुलिसकर्मी , अथवा कोई भी मुलाजिम सबको अपनी औकात दिखाते व् बताते रहते हैं .कुछ इस तरह .........

" यहाँ के हम सिकन्दर ,
चाहें तो सबको रख लें अपनी जेब के अंदर,
अरे हमसे बचके रहना ओ खुद्दारों ......."

मंत्री जी के कार्यकाल में उनका ज्यादा समय भाषणों और दौरों में गुजरता है,कुछ वादे भी करते हैं जनता से , चाहे वो झूठी ही क्यों ना हो . ???
और फिर शुरू होता है उनका भाषण का सिलसिला संबोधित करते हैं जनता को ........

"तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें गरीबी  दूंगा"

और जनता के हित में मिले रुपयों  को वो अपने ही अरमान खरीदने में लूटा देते हैं .
और सोंचते हैं ...........कुछ इस तरह .......
"कुर्सी दिलानेवाले क्यों तुने कुर्सी बनाई,
तुने काहे को कुर्सी दिलाई,
तुने काहे को कुर्सी दिलाई,
 कुर्सी दिलानेवाले क्यों तुने कुर्सी बनाई."

वो जनता को लूटना खसोटना शुरू करते हैं, कभी मह्नगाई बढ़ाकर, तो कभी ये टैक्स तो कभी वो टैक्स लगाकर ........
धीरे धीरे यूँ ही साल गुजरने लगे, फिर आया वोटों का मौसम .
नेता जी पहुंचे फिर............कुछ इस तरह .....

" वोटों के मौसम ने मुझको बुलाया,
मैं लूटेरा फिर वोट लूटने आया,
झूठे वादों से जनता को बहलाया,
झूठे वादों से जनता को बहलाया,
मैं लूटेरा फिर वोट लूटने आया."

जनता भी कहाँ बेवकूफ रही समझदार हो गयी,उसने भी नेता जी के सुर  में सुर  मिला दिया....
कुछ इस तरह ..........

"आइये आपका इंतज़ार था,
 देर लगी आने में तुमको ,
सुक्र है फिर भी आये तो ."

और नेता जी जनता के इस आवभगत से खुश होकर चल गए,अपनी जीत की तैयारी  में.
फिर आया परिणाम घोषणा का समय.
अब नेता जी का हाल कुछ इस तरह था ( कुर्सी छूटने के बाद)

" क्यों बेईमानी की राह में मशहूर हो गए,
इतने छले आवाम को कि गद्दी से दूर हो गए,
ऐसा नहीं कि हमको कोई भी ख़ुशी नहीं,
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं,
पाया कुर्सी तो ऐसा लगा सबकुछ पा लिया,
बैंक बैलेंस, मोटर गाड़ी, प्रोपर्टी बना लिया,
क्यों बेईमानी की राह में मशहूर हो गए,
इतने छले आवाम को कि गद्दी से दूर हो गए.
**********************
आपसब के विचार कि प्रतीक्षा में .......

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

Tuesday, May 4, 2010

भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त किया जाये .?


आज देश की चरमराती हालत हमें सोंचने पर मजबूर कर रहे भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त किया जाये .???
क्या सविधान को कोई ऐसी कानून बनाना चाइये जो जनहित से सम्बंधित हो .
क्या कारण है ( भ्रष्टाचार ) इसका ? .?जनता की गरीबी, जनता का अशिक्षित होना,
शिक्षित होकर भी विवश होना या अपने ही हाथों चुने हुए नेताओं के द्वारा कठपुतली सा बना रहना
आपके विचार सम्मान्निये हैं कृपया अपने विचार से इस उत्कंठा को और भी सहयोगी विचार दें ..

Sunday, March 7, 2010

महिला दिवस पर कुछ (महिला सशक्तिकरण की चुनौतियाँ)

एक लेख.

महिलाओं के साथ सदियों से भेदभाव बरता गया.पुरुष प्रधान समाज ने प्रत्येक क्षेत्र में औरत को एक वस्तु के
रूप में उपयोग किया, महिलाओं की भेदभाव की सिथिति लगभग पूरी दुनियां में रही,इस दिशा में सकारात्मक
प्रयास भी किये गए, 8 मार्च 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.
भारत में २००१ को महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में मनाया गया , तथा महिलाओं के कल्याण हेतु पहली बार
राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति बनाई गयी,जिसमे महिलाओं की सिक्षा,रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा में सहभागिता
को सुनिश्चित कराया गया.सामाजिक आर्थिक नीतियाँ बनाने के लिए महिलाओं को प्रेरित करना.महिलाओं
पुरुषों को समाज में सामान भागीदारी निभाने हेतु प्रोत्साहित करना.बालिकाओं एवं महिलाओं के प्रति विविध
अपराधों के रूप में व्याप्त असमानताओं को ख़त्म करना.बहुत सारी योजनाओ को भी सरकार ने महिलाओ की
सिथिति को सुधारने के लिए गठित किये, जिनमे, इंदिरा महिला योजना, एक योजना १५ अगस्त २००१ को
ऋण योजना शुरू की गयी जिसे १५-से १८ वर्षीय किशोरियों के लिए बनायीं गयी.

७३ वे ७४ वे संविधान संशोधन द्वारा देशभर में ग्रामीण व् नगरीय पंचायतों के सभी स्तर पर महिलाओं हेतु एक
तिहाई सीट आरक्षित की गयी.भारत सरकार ने वर्ष २००१ में राष्ट्रीय पुरस्कारों की स्थापना करते हुए महिलाओं को
सशक्त बनाने हेतु भारतीय तलाक ( संसोधन)२००१ की पारित (१) महिलायों पर घरेलु हिंसा(निरोधक)
अधिनियम २००१ (२)परित्यक्ताओं हेतु गुजारा भत्ता (संसोधन) अधिनियम २००१(२) बालिका अनिवार्य
शिक्षा एवं कल्याण विधेयक २००१.उपरोक्त सरकारी सुविधाओं के बावजूद अपेक्षित लाभ
नहीं मिल पाया है,अनेक जगह अनेक बढ़ाएं अभी भी मुंह बाये खड़ी हैं.प्रथमतया पुरुष वर्ग की प्रधानता समाज में
आज भी बनी है,नारी का शोषण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवार,सम्पति,
वर का चयन,खेल,शासकीय सेवा,शिखा,विज्ञापन,फिल्म,असंख्य कानून होने के बावजूद बने हैं.पर,
कुछ वर्षों से महिलायों की रहन सहन के सामाजिक स्तर में काफी बदलाव आये हैं, वे अब हर क्षेत्र में अपने
कदम आसानी से बढ़ाने लगी है,ये भी अपने जीवन में आज़ादी को मायने देती हैं यहाँ आज़ादी का मतलब है, पैसा,पॉवर,मन की आज़ादी, बेहतर जॉब.अगर अच्छी जॉब हो तो पैसा,पॉवर, और आज़ादी खुद ब खुद आ जाती है.
आज भी महिलाओं के लिए उनका परिवार ही सबसे ज्यादा मायने रखता है,यह एक ऐसा ट्रेंड है जो कभी नहीं बदला,परिवार को एक सूत्र में पिरोनेवाली महिलाएं आज पुरुषों के साथ या उनसे आगे चल रही
पर उनके लिए आज भी सबसे ज्यादा परिवार ही महत्व रखता है,महिलाएं हर क्षेत्र में आज अपनी सक्रिय
भूमिका निभा रही हैं,अब उनकी आज़ादी पर पाबंदियां जैसे बंदिशें टूटने लगे हैं,जिसका सारा श्रेया खुद
महिलाओं को जाता है...आप सभी महिलाओं को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें हम महिलायें ऐसे ही
आगे बढ़ते रहें....

Monday, February 8, 2010

ये माँ तू कैसी है ?

हम उम्र के किसी भी पड़ाव में हों,हमें कदम,कदम पर कुछ शरीरिक मानसिक कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है,वैसे क्षण में यदि कुछ बहुत ज्यादा याद आता है तो वो है..... माँ का आँचल,म की स्नेहल गोद,माँ के प्रेम भरे बोल. माँ क्या है?तपती रेगिस्तान में पानी की फुहार जैसी,थके राही के तेज़ धूप में छायादार वृक्ष के जैसे. कहा भी जाता है----- मा ठंडियाँ छांवां ----- माँ ठंडी छाया के सामान है.जिनके सर पर माँ का साया हो वो तो बहुत किस्मत के धनी होते है, जिनके सर पे ये साया नहीं उनसा बदनसीब कोई नहीं... पर, कुछ बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर माता पिता से आँखें चुराने लगते हैं unhe सेवा, उनकी देखभाल उन्हें बोझ लगने लगती है..जबकि उन्हें अपना कर्तव्य पूरी निष्ठां से करने चाहिए.

मैंने माँ का वर्णन कुछ इस तरह किया है..

ए माँ तू कैसी है ?

सागर में मोती जैसी है.नैनो में ज्योति जैसी है.
नैनो से ज्योति खो जाये,जीवन अँधियारा हो जाये,
वैसे ही तेरे खोने से,जीवन अँधियारा हो जाये.

क्यों ममता में तेरे गहराई है ?
किस मिटटी की रचना पाई है ?
बच्चे तेरे जैसे भी ,सबको गले लगायी है.

ए माँ तू कैसी है ?दीये की बाती जैसी है.
जलकर दीये सा खुद,तम हमारा हर लेती है.

बाती न हो दीये में तो,अन्धकार कौन हर पाए ?
वैसे ही तेरे खोने से, जीवन अँधियारा हो जाये.

ए माँ तू कैसी है ? कुम्हार के चाक जैसी है,
गीली मिटटी तेरे बच्चे,संस्कार उन्हें भर देती है.

ए चाक यदि ना मिल पाए,संस्कार कौन भर पायेगा ?
कौन अपनी कलाओं से ये भांडे को गढ़ पायेगा ?
जीवन कली तेरे होने से ही,सुगन्धित पुष्प बन पायेगा.

ये माँ तू कैसी है ?प्रभु की पावन स्तुति है.
पीर भरे क्षणों में, सच्ची सुख की अनुभूति है.

कोई ढाल यदि खो जाये,खंज़र का वार ना सह पायें.
वैसे ही तेरे खोने से जीवन अँधियारा हो जाये.

ये माँ तू कैसी है ? सहनशील धरा जैसी है.अपकार धरा सहती है,
फिर भी उफ़ ना कहती है.ये धरा यदि खो जाये,जीवन अँधियारा हो जाये.

ये माँ तू कैसी है ?

सबसे पावन,सबसे निर्मल ,तू गंगा के जैसी है.
ममता से भरी मूरत है,तुझमे bhagvan की सूरत है.

जो झुका इन चरणों में,स्वर्ग सा सुख पाया है |

Thursday, February 4, 2010

मुझे गर्व है की मै एक बेटी की मां हूँ

समाज चाहे वो मध्यम वर्ग का हो या उच्च वर्ग का हर किसी के मन में एक बेटे की चाह जगती है, बेटे को जन्म देने में वो
मां भी खुद को काफी भाग्यशाली समझती है की मै एक बेटे की माँ हूँ ,जबकि खुद वो एक बेटी थी कभी
और अपने लड़की होने का गौरव भी वो खो देती है बेटे और बेटी में अंतर ला कर ,मैंने तो औरतों को भी कहते
सुना है बेटी है ,यदि बेटा होता तो अच्छा था, पहली संतान बेटी हो गयी तो बेटे की चाह में कितने बेटी संतान
को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है और न मारा तो एक बेटे की चाह में कई बेटियां कर लेते हैं खामियाजा, सही पालन पोषण बच्चों को नहीं मिल पाता, बेटा
एक हो या दो उसे मनुहार भी बेटियों से ज्यादा देते है, बेटियां गुण से भरी होती हैं पर कोई मूल्य नहीं देते
बेटा औगुन से भरा हो पर बेटा है न ....ये गलत धारणाएं आखिर कब तक लोगों के man में रहेगी .......
मैंने इस धारणा का खुलकर विरोध किया,मेरी भी एक ही संतान है वो भी बेटी, आज मेरी बेटी 10
साल की है,मेरे घरवालों ने ही मेरे माता पिता ससुराल पक्ष के लोग सभी कहते रहे एक बेटा हो जाने दो पर
मैंने अपनी जिद ठान ली की बस एक ही रहेगी, बेटी है पर बेटा से कम नहीं और मेरी जिद से मैंने आज ये
साबित कर दिखलाया की कोई भी गलत धारणा का विरोध एक नारी ही कर सकती है हाँ कुछ लोगों की अपवादी
बातें मैंने भी सुनी जैसे बेटा एक कर लेती तो जीवन सुखी होता क्यों बेटी से जीवन सुखी नहीं होता क्या ?
बेटियां तो मायका और ससुराल दोनों घरों की मर्यादा के साथ साथ अपनी हर जिम्मेवारी को बखूबी
निभाती है मुझे गर्व है की मैंने एक गलत धारणा को बदलने में अपना धेर्य नहीं खोया .औरतें ताना सुनकर अपने विचार बदल देती हैं लग जाती हैं बेटे संतान की तैयारी में , पर मेरे विचार से मेरे आस पास के लोग प्रेरित होकर आज ये धारणाएं बदलने लगे हैं वो बेटी संतान में विश्वास कर रहे, संतान यदि बेटी हुई तो आगे की सोंच नहीं कर रहे एक बेटी में ही काफी लोग खुश हैं ,अगर ये धारणा नहीं बदलेगा तो बेटा,बेटी की चाहत में कितने बेटियां पैदा होने से पहले ही मारी जाती रहेंगी,और इसकी काफी हद तक जिम्मेवार औरत है ....
मुझे गर्व है की मै एक बेटी की मां हूँ ........